कुछ पल ऐसे भी थे जब आँसू रुक ही नहीं रहे थे,
माँ ही थी अकेली जिसने इस दर्द को समझा था।
पूछा था कि अगर तू बोले तो सारी उमर,
तुझे ऐसे ही रहने दूँ...
मन तो भर आया था पर फिर नज़र,
मेरे पापा और भाई आए।
नज़र आया तो बस मायूस चेहरे...
कुछ पल ऐसे भी थे जब मैंने खुद से पूछा,
क्या मैं जिंदगी भर सब को रुलाऊँगी?
फिर बस आँसू रुक से गए।
पता था कुछ सही नहीं है पर मुस्कुरा,
कर आगे चल दिए।
फिर कभी आँसू नहीं बहे...
सन्नाटा सा था, कुछ भी सही नहीं था,
पर हम सबसे हँसके मिल लिए।
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