Saturday, July 11, 2026

सौदा और स्याही

 दो दिल जो खुद से जुड़ बैठे,

उन्हें दुनिया ने आकर तोड़ दिया।

फिर नाप के दौलत, जात, नसब,

एक अनचाहा रुख मोड़ दिया।


जो कम पड़ जाए हुस्न कहीं,

तो तराजू में दहेज ढल जाता है।

फिर महफ़िल हंस कर कहती है—

"जोड़ा तो ऊपर से बन कर आता है।"


पर सवाल यही रह जाता है,

इस झूठे जग के मेले में—

क्या जोड़ी वो थी जो खुद महकी?

या वो, जो बिकी झमेले में?




जो कह न सके इस दुनिया से,

वो ख़ामोशी को चुनते हैं।

दिल के छाले, जज़्बात अपने,

वो कागज़ पर फिर बुनते हैं।


जो लिख न सके वो पढ़ते हैं,

उन बहते हुए अलफ़ाज़ों को।

इक आह भर के सहलाते हैं,

अपने ही दबे आवाज़ों को।

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