Saturday, January 17, 2026

वक्त की रेत!!

 सपने इतने ऊँचे देखो, आँखें न मूँद पाएँ,

जब तक मंज़िल मिल न जाए, नींद न पास आए।

पर हकीकत बड़ी कड़वी है, ए दोस्त ज़रा देख,

ढलती उम्र में नींद और ख़्वाब, दोनों छोड़ जाएँ।


सब यहीं छूट जाना है, फिर ये कैसा मलाल है?

नींद और सपनों का साथ चलना, बस एक सवाल है।

हम तो वहीं ठहरे रहे, पर वक्त भागता गया,

हमें पीछे धकेल कर, अपना रस्ता नापता गया।



इस दौड़ में अक्सर, मुस्कान भी खो जाती है,

सपनों के साथ अपनों की पहचान भी खो जाती है।

न जाने क्या-क्या संग लेकर, ये गुज़र जाता है,

पीछे बस यादों का एक धुंधला सा साया छोड़ जाता है।


जब अंत निश्चित है सबका, तो ये कैसी बेबसी है?

जाने क्यों दिल से जाती नहीं, ये जो अजीब सी उदासी है।

कोई आए और ले जाए, इस खामोश दर्द को अपने साथ,

अब ये बोझिल रूह मेरी, माँगे उम्र भर की मात।


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